गुरुवार, 19 मार्च 2009

ग़म,खुशी


किस कदर ग़मज़दा हूँ मैं,
हर वक्त हँसता रहता हूँ मैं।

समन्दर हूँ,न कोई दरया,
इन्सां हूँ,हमेशा बहता हूँ मैं।

लफ्ज़ नही है कम-सुखन हूँ,
मुसलसल सोचता रहता हूँ मैं।

कोई उम्मीद बाकी नही, लेकिन
कुछ कभी-कभी कहता हूँ मैं।

जुदा हो गए,कहाँ-कहाँ हो गए,
बस तुम्हे ही देख रहता हूँ मैं।

तू खुदा,खुदा भी तो नहीं ,
जाने क्या-क्या कहता हूँ मैं।

मुझसे छुटी अब तेरी गली भी,
देख अब कहाँ हो रहता हूँ मैं।

आज भी तुम्हारा इंतजार हैं,
दिए की तरह जलता हूँ मैं।

इस दर्जा मुत्मईन हूँ तेरी कसम,
बिन बहलाये,बहलता हूँ मैं।

एक मिनट गाफ़िल नहीं तुझसे,
सोते से भी जाग उठता हूँ मैं।

5 टिप्‍पणियां:

deep1 ने कहा…

wow kya baat hai

deep1 ने कहा…

hai

दर्पण साह 'दर्शन' ने कहा…

wah...
आज भी तुम्हारा इंतजार हैं,
दिए की तरह जलता हूँ मैं।

तू खुदा,खुदा भी तो नहीं ,
जाने क्या-क्या कहता हूँ मैं।

ek meri taraf se(jaanta hoon aap urdu ke proffesor hain par aasha hai 'behar' aadi ke liye muaaf kareinge):

doosre gharon main pathar uchale,
apne ghar ane par sambahlta hoon main.


tum kehte ho ki, mein khamosh kyun hoon,
apni khamoshiyon se hi sub kehta hoon mai.

teri yaado ko ashaar banake 'darshan'
gum tere yun sehta hoon main.

rachana ने कहा…

SHAYBHI DIL KA EK AAINA HAI
BATA DETI HAI KI DIL MEIN HAAN YA NA HAI...

bhootnath( भूतनाथ) ने कहा…

lo kar lo baat.........main to baavlaa hi ho gayaa....!!bahut acchi....bahut acchhe.......!!